भारतीय धार्मिक इतिहास में शनि सबसे शक्तिशाली देवता हैं। उसका रंग काला है और वह न्याय का स्वामी है। ज्‍योतिष में, इनका बहुत महत्‍व है, वह मकर और कुंभ राशि के स्वामी हैं। क्‍योंकि इनकी कृपा से जहां वारे-न्‍यारे हो जाते हैं, वहीं इनका प्रकोप बहुत भारी पड़ जाता है। कुंडली में वह दसवें और बारहवें भाव के स्वामी हैं। दसवां भाव पिता, रोजगार, कार्य, व्यवसाय, परिश्रम, मान सम्मान का होता है। बारहवें स्थान में स्थित शनि को शुभ और अशुभ दोनों फल देने वाला कहा है।

शनि को प्रसन्न करके व्यक्ति जीवन के कष्टों को कम कर सकता है. साथ ही करियर और धन के मामले में सफलता पा सकता है.

जय शनि देवा – श्री शनिदेव आरती

जय शनि देवा, जय शनि देवा,

जय जय जय शनि देवा ।

अखिल सृष्टि में कोटि-कोटि जन,

करें तुम्हारी सेवा ।

जय शनि देवा, जय शनि देवा,

जय जय जय शनि देवा ॥

जा पर कुपित होउ तुम स्वामी,

घोर कष्ट वह पावे ।

धन वैभव और मान-कीर्ति,

सब पलभर में मिट जावे ।

राजा नल को लगी शनि दशा,

राजपाट हर लेवा ।

जय शनि देवा, जय शनि देवा,

जय जय जय शनि देवा ॥

जा पर प्रसन्न होउ तुम स्वामी,

सकल सिद्धि वह पावे ।

तुम्हारी कृपा रहे तो,

उसको जग में कौन सतावे ।

ताँबा, तेल और तिल से जो,

करें भक्तजन सेवा ।

जय शनि देवा, जय शनि देवा,

जय जय जय शनि देवा ॥

हर शनिवार तुम्हारी,

जय-जय कार जगत में होवे ।

कलियुग में शनिदेव महात्तम,

दु:ख दरिद्रता धोवे ।

करू आरती भक्ति भाव से,

भेंट चढ़ाऊं मेवा ।

जय शनि देवा, जय शनि देवा,

जय जय जय शनि देवा ॥

॥ श्री शनि देव आरती-2 ॥

चार भुजा तहि छाजै,

गदा हस्त प्यारी ।

जय शनिदेव जी ॥

रवि नन्दन गज वन्दन,

यम अग्रज देवा ।

कष्ट न सो नर पाते,

करते तब सेवा ॥

जय शनिदेव जी ॥

तेज अपार तुम्हारा,

स्वामी सहा नहीं जावे ।

तुम से विमुख जगत में,

सुख नहीं पावे ॥

जय शनिदेव जी ॥

नमो नमः रविनन्दन,

सब ग्रह सिरताजा ।

बन्शीधर यश गावे,

रखियो प्रभु लाजा ॥

जय शनिदेव जी ॥

जय शनि देवा – श्री शनिदेव आरती अंग्रेजी में

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